धाम अपने चलो भाई। पराये देश क्यों रहना।। (Sunday, June 1, 2014)
धाम अपने चलो भाई। पराये देश क्यों रहना।।
काम अपना करो जाई। पराये काम नहिं फसना।।
नाम गुरु का सम्हाले चल। यही है दाम गठ बंधना।।
जगत का रंग सब मैला। धुला ले मान यह कहना।।
भोग संसार कोई दिन के। सहज में त्यागते चलना।।
सरन सतगुरु गहो दृढ़ कर। करो यह काज पिल रहना।।
सुरत मन थाम अब घट में। पकड़ धुन ध्यान घर गगना।।
फंसे तुम जाल में भारी। बिना इस जुक्ति नहीं खुलना।।
गुरु अब दया कर कहते। मान यह बात चित धरना।।
भटक में क्यों उमर खोते। कहीं नहिं ठीक तुम लगना।।
बसो तुम आय नैनन में। सिमट कर एक यहां होना।।
दुई यहां दूर हो जावे। दृष्टि ज्योति में धरना।
श्याम तजि सेत को गहना। सुरत को तान धुन सुनना।।
बंक के द्वार धंस बैठो। तिरकुटी जाय कर लेना।।
सुन्न चढ़ जा धसो भाई। सुरत से मानसर न्हाना।।
महासुन चैक अंधियारा। वहां से जा गुफा बसना।।
लोक चैथे चलो सज के। गहो वहां जाय धुन बीना।।
अलख और अगम के पारा। अजब एक महल दिखलाना।।
वहीं जाय स्वामी से मिलना। हुआ मन आज अति मगना।।