जय गुरू देव समाचार

दिनांक 24 मई 2014 प्रातः सत्संग उज्जैन आश्रम परम् संत उमाकान्त जी महाराज द्वारा-
 दिनांक 24 मई 2014 प्रातः सत्संग उज्जैन आश्रम परम् संत उमाकान्त जी महाराज द्वारा- आप सब लोग भाग्यशाली हो जो गुरू महाराज के पास पहुॅच गये थे जिनको समरथ  गुरू मिले। मगर पहिचानते है कहीं थोडे़-थेाड़े । पहचान आपके श्रद्धा के अनुसार हुई जिनकी दुकान नहीं चल रही थी तो  उन्होने कहा हमारी दुकान चल जाए, नौकरी लग जाए तो इसी प्रकार की मनोकामना के अनुसार दया हुई और लोगों को लाभ मिला और आप लोग बस इसी तक सीमित रह गये। मगर जिसने अंतर में देखा भजन किया वह कहता है यही सब कुछ  है जैसे जहान मिल गया ऐसे पहचानते है थोडे़-थेाड़े।
    गुरू महाराज तो चले गये कुछ लोगो को भ्रम हो गया तो भ्रम का इलाज नहीं होता है, लेकिन शंका निकलती है मगर देर से निकलती है जैसे कोई काँटा है, लग गया कोई युक्ति बताने वाला मिल गया और उसे सुई से निकालने वाला मिल गया  है तो काँटा निकल गया तो शंका ऐसे ही  निकलती है, बहुतांे की षंका निकल गई लेकिन दया गुरू महाराज की बराबर हो रही है बल्कि कई गुना ज्यादा हो रही है। आप जितने भी सत्संगी हंै आप लोग भजन करो तो और गुरू महाराज से दया माँगो। इस कार्यक्रम में आप जब तक हो भजन करो, ध्यान करो, आपको श्रद्धा, भाव, भक्ति के अनुसार दया मिलेगी तो अन्तर में गुरू महाराज के  दर्शन हो जाएंगा।
जब तक आप लोग यहां पर हैं, खूब भजन करो और सेवा करो। आप भाग्यशाली हो जिनको गुरू महाराज जैसे समरथ सतगुरू मिले ऐसे समरथ मिले कि ‘‘नाम लेत भवसिंधु सुखाई’’ कहते हैं, भवसागर में फंस गये तो भवसागर से निकलना है तो भजन करो । इस मलीन युग में कम मेहनत करनी पड़ती है बस ध्यान इधर से हटाया और काम बन गया। ये सब निर्भर करता है गुरू की दया पर वे कब, किस पर दया कर दें। पात्र बनाना पड़ता है अगर पात्र बन जाये तो गुरू कि दया हो जाए।
    पहले बड़ी मंेहनत करनी पड़ती थी शरीर जर्जर हो जाता था मगर अब आसान हो गया। यह है संत मत, यहां थ्योरी है बाद में और पहले प्रेक्टिकल है।  इस लिए अनपढ़ लोग भी यह विद्या जान जाते हंै। दुनियां की सारी विद्या खतम हो जाती है वहाँ से ये विद्या षुरू होती है।
    जो गुरू महाराज के शिष्य हैं। आपके गुरू वहीं रहेगें मै आपका गुरू नहीं हो सकता हूँै ये मत सोचना कि मैं आपका गुरू बन गया हूँ। ये बात जरूर है कि  आपकेी जो समस्या बाहर की है  घर ,परिवार, दुकान, रोग बीमारी, षादी-ब्याह, मुन्डन ये सब मंै आपका करता रहूँगा और अगर कहो की आत्मा की सम्हाल, वो सम्हाल गुरू महाराज ही करेंगे। इनको आप मस्तक पर सवार रखो इनसे प्रेम करो तो आपका काम बन जाएगा।
    एक राजा था जिसने बाजार लगवाया और ये कहा कि जिसे जो लेना है, आकर ले जाए। तो लोग इस बाजार में जाकर अपने-अपने पसंद का समान लेने लगे। लेकिन कुछ होते हंै, जो पहले बाजार को जानना पसंद करते हंै जो वे बाजार से होते हुए अन्दर महलो में चले गये तो वहां मिल गया सोना तो उस सोने को ही देख कर उसे उठा लिया और ले कर चले गये उसी प्रकार जो साधन भजन करते है और सहस कँवल दल तक पहुँचे तो ये मान लो कि उनको मिला सोना, सोना मिला और जो आगे बढ़े साधना की, उनको मिला मोती, मोती मिला, जो आगे बढ़े उनको हीरा मिला, और जो फिर आगे बढ़े उनको सतपुरूश मिले जिन्हे कुल मालिक कहा गया । वहां पहुँच गये तो वो तार लगा देते हंै तो फिर उसमें कोई फरक ही नहीं रह जाता है वह सतपुरूश जैसा ही हो जाता है। गोस्वामी जी महाराज ने कहा ‘‘सोई जानेहि जेहि देहि जनाई जानत तुमहि तुमहि हो जाई’’। जैसे 440 बोल्ट का करेन्ट है तार पकड़ करके आप लटक जाओं तो जितना करेन्ट पाॅवर उस तार में , है उतना आपके षरीर में हो जाएगा उतनी ही ताकत षरीर में हो जाएगी उसी तरह से जो उस मालिक के पास पहँुच जाते है। मालिक जैसे ही हो जाते हैं।  तो उस मालिक की सारी ताकत उसमें आ जाती है यानी कि इतनी ताकत आ जाती है कि नीचे की सब रचना कर सकती है। आत्मा किसको कहते है, इस षरीर को चलाने वाली षक्ति जिसके निकल जाने के बाद बड़े-बड़े  वैज्ञानिक पण्डित, मुल्ला, पुजारी फेल हो जाते हंै। कौन सी चीज निकल गई ईष्वर अंष जीव अविनाषी ये जीवात्मा उसकी अंष है इसमें वो पाॅवर आ जाता है जैसे लोहा को चुम्बक जब खींच लेता है खींचता है और उसमें मिल जाता है ऐसे जब खींचकर निकालो तो वही पावर उसमें भी आ जाता है। चुम्बक के गुण लोहे में भी आ जाते हंै। उसी तरह से इस जीवात्मा में यानी सब रचना करने की ताकत आ जाती है। यानी दुनिया की चीजों के लिए भगत को जरूरत नहीं पड़ती ये चीजे अपने आप आती है ‘‘जो इच्छा कीन्ही मन माही हरि प्रताप कुछ दुर्लभ नाही’’ यह काल भगवान का देष है यानी इसी की सारी व्यवस्था है । अब आप इस बात को समझो  कि अगर उससे ऊपर पहुंच गये उसके बाद इधर आने की इच्छा जब हुई और आये वो सारी चीजों को मुहैय्या करा देता है। जैसे कोई कलेक्टर है जिले का मालिक है लेकिन जब वो ऊपर चला गया और अच्छे ओहदे पर चला गया सचिव बन गया सचिवालय में और जब लौटकर इधर आयेगा कलेक्टर के क्षेत्र में आयेगा।  तो उसे हर प्रकार की सुविधा यहां मिलेगी ये ऊँचे ओहदे के है, ऊँचे वर्ग के अधिकारी है उसी तरह से ये जीवात्मा मालिक तक पहुच जाती है और फिर जब वो वापस इस मनुश्य षरीर में आती है तब किसी चीज की कमी नहीं रहती है।

Updation On Saturday, May 24, 2014