राजा का न्याय (Wednesday, May 7, 2014)
पुराने समय की बात है, काशी में वीरबाहु नाम के एक राजा राज्य करते थे| रात- दिन वे प्रजा के सुख की चिंता करते थे| वे अपनी प्रजा को पुत्र के समान प्यार करते थे| इसीलिए उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी| उनका न्याय बड़ा निष्पक्ष होता था| वे अपराधी को बहुत कड़ी सजा देते थे| उनके न्याय की चारों ओर धूम थी|

      वीरबाहु की रानी का नाम सुमति था| वह अपने बाप की इकलौती बेटी थी, इसलिए उसका बचपन बड़े लाड़-प्यार में बीता था| अधिक लाड़-प्यार से उसका स्वभाव कुछ हठी और घमंडी था लेकिन फिर भी ससुराल में उसकी बड़ी इज्जत थी | उसके रूप तथा गुण के कारण राजा भी उसे बहुत चाहते थे|


      सर्दी के दिन थे| एक दिन रानी अपनी सहेलियों के साथ पालकी पर सवार हो गंगा स्नान को गयी| कड़ाके की सर्दी थी | जाड़े के मारे हाथ पैर ठिठुरे जा रहे थे| स्नान करने के बाद रानी और उसकी सहेलियों को खूब ठंड मालूम हुई| जब न सहा गया तो रानी ने इधर उधर देखा| किनारे पर उसे घास-फूस की एक छोटी सी झोंपड़ी दिखाई दी | एकाएक उसके मन में यह विचार आया कि इसे जलाकर इसकी आंच के पास थोड़ी देर बैठा जाय तो ठिठुरन दूर हो जायगी| उसने यह विचार कर अपनी सहेलियों से कहा, “आओ, इस झोंपड़ी को जलाकर तापें |” एक सहेली ने कहा, ‘बेचारे किसी गरीब की झोंपड़ी इसे जलाना अच्छा नहीं| झोंपड़ी के बिना बेचारा कहाँ मारा मारा फिरेगा ?” रानी ने घमंड के साथ कहा, “दो चार रुपयों की ही तो झोंपड़ी है इसे जलाने से उसका कौन सा बड़ा नुकसान हो जायगा? हुआ भी तो दूसरी बनवा दी जाएगी, आखिर है तो चार तिनकों की ही झोंपड़ी|” झोंपड़ी में आग लगा दी गई | उसे जलती देखकर रानी और उसकी सहेलियां ठठाकर हँस पड़ी | थोड़ी देर में आग धधक उठी और झोंपड़ी जलकर राख हो गयी| उस झोंपड़ी की आग ताप कर सबने अपनी ठंड दूर की और राजमहल लौट गयीं| वह झोंपड़ी एक गरीब आदमी की थी| इसके जल जाने से वह बहुत दुखी हुआ और राह का भिखारी बन गया| रानी ने उसकी झोंपड़ी जलाई थी इसीलिए बेचारा करता क्या? मन मसोस कर रह गया|


      लोगों के समझाने बुझाने पर उसकी कुछ हिम्मत बंधी और राजा के पास गया | रोते रोते उसने अपनी पूरी रामकहानी राजा को सुना दी| यह सुनकर राजा को बहुत दुख हुआ| उसने रानी से पूछा, “क्यों महारानी? तुमने यह क्या किया? एक गरीब की झोंपड़ी जलाना क्या तुम्हें शोभा देता है ?” रानी सुमति घमंड में ऐंठ उठी | उसने तुरन्त जवाब दिया, “एक घास-फूस की झोंपड़ी के लिए इतना तूफान ? चिंता न करें, दूसरी बनवा दूंगी |” यह सुनकर राजा तमतमा उठा और बोला – “रानी ! तुम्हारा यह घमंड वीरबाहु की पत्नी के लिए ठीक नहीं, तुम्हें तो दीन दुखियों की सेवा करनी चाहिये| तुमने यह क्या किया? तुमने एक आदमी का घर जला कर उसे अनाथ बना दिया है| तुम्हारा यह काम बहुत ही खराब है| जब तक तुम अपनी ही मेहनत से दूसरी झोंपड़ी तैयार नहीं करा दोगी, तब तक उस गरीब के साथ न्याय नहीं होगा| तुम्हें उसकी झोंपड़ी फिर से बनानी होगी और अपनी ही मेहनत से|” रानी को तुरन्त राजमहल से बाहर हो जाना पड़ा| उसका घमंड चूर-चूर हो गया| अब उसकी आँखें फैल गयीं| उसे अपने किये पर बहुत पछतावा होने लगा| वह अब बड़ी असहाय थी| झोंपड़ी कैसे बनवायी जाय, यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था| उसके ऊपर दुख का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन वह हताश न हुई| उसने जंगल से लकडियां काट काट कर बेचना शुरू कर दिया | इससे जो कुछ मिलता, उससे वह अपना पेट भरती और कुछ बचा लेती | गर्मी-सर्दी और बरसात कि परवाह किये बिना ही वह जी-तोड़ परिश्रम करती थी|


      इस तरह एक वर्ष बीत गया| अब उसके पास एक झोंपड़ी बनवाने का पैसा हो गया था | उसने अपने ही पसीने की कमाई से एक झोंपड़ी तैयार करवा दी| उसे अब यह अच्छी तरह मालूम हो गया कि राजा के लिए महल बनवाना कितना आसान है तथा गरीब के लिए झोंपड़ी बनवाना कितना कठिन है| उसने उस गरीब से क्षमा मांगी| रानी की हालत देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गये| अपनी महारानी के दुख से वह लज्जित हो उठा और बोला, “महारानी ! गरीबों की झोंपड़ी का मूल्य एक गरीब ही जानता है|” राजा वीरबाहु महारानी की मेहनत और सच्चे पाश्चाताप को देखकर बहुत खुश हुए | उन्होंने महारानी को बड़े आदर के साथ राजमहल में बुला लिया|