भगवान के दर्शन (Wednesday, May 7, 2014)
एक दिन अकबर ने बीरबल से प्रातः काल जल्दी आने को कहा। बीरबल प्रतिदिन प्रातः साधना किया करते थे। इस कारण कुछ देर हो गयी। अकबर ने देरी का कारण पूछा तो बीरबल ने कहा-"इतनी देर मुझे भगवान ने रोक रखा । जब तक वे मुझसे प्यार भरी बातेँ करते रहे, तब तक मैँ वहाँ से कैसे आ सकता था।"

अकबर ने हठ किया - "बीरबल ! तब तुम मुझे भी भगवान के दर्शन कराओँ।" बीरबल ने उत्तर दिया-"शहंशाह एक कटोरे मेँ दूध मँगा दे, अभी दर्शन करा देता हूँ।"

दूध आ गया, बीरबल उस कटोरे के दूध मेँ धीरे-धीरे अँगुली फिराने लगे। ऐसी बातोँ मेँ थोडी देर हुई तो अकबर ने खीझकर कहा-"यह क्या कर रहे हो बीरबल?"

"मक्खन निकाल रहा हूँ, जहाँपनाह।"

"उँगली घुमाने से कहीँ मक्खन निकलता है, मक्खन निकालने के लिए तो रस्सी समेत मटकी और मथानी चाहिए।"

"बीरबल मुस्कराए, बोले-" यही तो मैँ भी कह रहा हूँ। जहाँपनाह! कहने मात्र से भगवान के दर्शन नही होते, वह तो अटूट श्रध्दा और भक्ति भावना द्वारा संत-सतगुरु द्वारा बताई गई साधना करने पर होते हैँ।"

बाबा जयगुरुदेव जी महाराज भी कहते हैँ " तुम नियमित रुप से रोज घाट पर बैठ कर साधना करो तो प्रभू का दीदार होगा अर्थात तुम्हारी तीसरी आँख एवं तीसरा कान खुल जायेगा परन्तु घाट पर बैठते ही नहीँ हो और कहते हो हमारा साधन ही नही बनता, आँख-कान खुलते ही नहीं ।"