बेदाग़ दाढ़ी (Wednesday, May 7, 2014)

एक राजा का नियम था कि वह नित्य एक अतिथि को भोजन करने के बाद ही भोजन करता था | एक बार राजा अपने कुछ मंत्री तथा दरबारियों के साथ भ्रमण को निकला | रास्ते में एक जगह डेरा पड़ा | राजा ने मंत्री से कहा कि किसी अतिथि को भोजन कराओ | जंगल के सूनेपन में अतिथि कहाँ ? मंत्री ढूंढते रहे  | उन्होंने देखा कि एक साधू तप कर रहे है | उन्हें उठायें  कैसे ? मंत्री भोजन लेकर वहीं पहुंचा और तपस्वी के मुंह को खोलकर भोजन उसमें डाल दिया | किन्तु साधू जी की समाधी नहीं टूटी | राजा का प्रण पूरा हुआ | जब मंत्री लौटे तो राजा के पूछने पर उस साधू की बात बता दी और यह कहा कि उनकी समाधी नहीं टूटी थी | राजा भी दर्शन करने गया | राजा ने देखा योगिराज बैठे हुये है | उनको बड़ी हैरत हुई | राज्य में लौट आए | एक वेश्या को बुलाया और जाकर कहा कि तुम जाकर उस साधू कि तपस्या भंग करो | वेश्या गयी बहुत नाचती गाती रही किन्तु योगिराज की साधना नहीं भंग हुई | हारकर  वेश्या लौटी | उसने राजा को सब बातें बताई | राजा ने कहा तुम वही रहो हम सारी सुविधा देते रहेंगे | वेश्या वहीं रहने लगी | साधु की समाधी टूटी किन्तु बाहर का वैभव विलास देखकर भी वे विचलित नहीं हुए  |  


             एक बार राजा उधर से गुजरा तो उसने कहा महाराज ! दिन कैसे कट रहे है ? साधू बोले- गुजारा कर रहा हूँ |  राजा को बुरा लगा कि वह तो सारी सुख सुविधा दे रहा है और इनका गुजारा होता है | कुछ दिन बाद राजा बीमार पड़ा तो साधू को बुलवाया | साधू पहुंचे | राजा दीन अवस्था में पड़ा था | साधू ने पूछा राजन कैसी तबियत है | राजा ने कराहते हुए कहा दिन काट रहा हूँ | साधू बोले  राजन इतने फ़ौज फाटे महल ऐश्वर्य के बीच तुम दिन काट रहे हो ?  राजा ने कहा - महाराज ! यह मेरे किस काम आ रहे है | मैं तो तड़प रहा हूँ |   साधू बोले राजन ! मैंने पहले तुमसे कहा था कि गुजारा कर रहा हूँ तो तुम्हें कितना बुरा लगा था | अब समझे | राजा चल बसा |


            कहते है किसी का स्वभाव नहीं बदलता है | वेश्या साधू के पास रहती थी पर उसका स्वभाव छुटा नहीं था | उसने एक कुत्ता पाल रखा था | एक दिन उसने पूछा महाराज ! आपकी दाढ़ी अच्छी है या मेरे कुत्ते कि दुम ? साधू ने कहा इसका जबाब तब दूंगा जब दुनिया से जाने लगूंगा | आई गई बात खत्म हो गयी | साधू जी का वक़्त पूरा हुआ | उन्होंने शरीर त्याग दिया | उनके भक्त लोग अर्थी उठाने की तैयारी करने लगे | वेश्या भी वहीं थी | उसे एकाएक अपने प्रश्न कि याद आ गयी | उसने साधू जी के शरीर को झकझोरना शुरू किया और बोली कि महाराज ! मेरे प्रश्न का उत्तर दे कर जाइये | साधु पूरे संत थे | उन्हें शरीर छोड़ने और आने में क्या लगता | उन्होंने आँखे खोली और अपनी लम्बी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा - उस दिन इसलिए नहीं बताया था कि जब तक यहाँ दुनिया में रहना है क्या मालूम कोई दाग लग जाए |  पर आज में बेदाग जा रहा हूँ | और साधु जी चिर समाधी में डूब गए |


         यह कहानी सुनाकार बाबा जी (प्यारे लाल ) ने कहा कि भाई संतो कि दाढ़ी में कोई दाग नहीं रहता है | तुम पास रहो तो समझवारी और होशियारी से रहो , उन पर विश्वास करो और उनकी बात मानो | बेकार कि बातों में पड़ने से क्या फायदा |