बदले की नई रीति (Wednesday, May 7, 2014)
 त्रेता के समय में सदन कसाई था | माँस बेचकर परिवार का पालन पोषण करता था | उसका नियम था कि एक बकरा रोज काटा जाय और उसके माँस को बेचने पर जो कुछ पैसा मिलता था उसमें उसे संतोष था |

      एक दिन उसके नगर में एक सरकारी अधिकारी आया | उसके सिपाही मांस लेने आये | शाम का समय था | सदन कसाई अपनी बिक्री समाप्त कर चुका था और अपने नियम के अनुसार रोज एक ही बकरा काटता है सिपाही इस बात को सुनकर नाराज हुआ | सदन कसाई सोचने लगा कि क्या किया जाय अंत में उसने सोचा कि सामने जो बकरा कल के लिए बंधा रखा है उसकी एक टांग काट ली जाय तो बात बन जायेगी और हमारा वसूल भी नहीं बदलेगा | मांस पाकर सिपाही खुश हो जायेंगे और बकरे को काल काट दूंगा |


      यह निर्णय करने के बाद सदन कसाई हाथ में गंडासा लेकर उठा और बकरे के पास पहुंचा | ज्यों ही उसने बकरे की टांग का निशाना बनाया त्यों ही बकरा हंस पड़ा | सदन कसाई का गंडासा रुक गया और बकरे से पूछने लगा कि भाई तुम हँसे क्यों ? बकरे ने जवाब दिया कि तुम अपना काम करो – यह जानने से तुम्हें क्या काम ? सदन कसाई बोला कि नहीं तुम्हें बताना पड़ेगा |


      बकरे ने हंस जवाब दिया कि अब तक हम तुमको काटते रहे और तुम हमको काटते रहे | यह अदला-बदला हमारा तुम्हारा युगों युगों से चला आ रहा है | अब तुम यह नई रीति कैसी निकाल रहे हो कि मेरी एक टांग काट दोगे और मैं रात भर तड़पता रहूंगा क्योंकि जिस तरह तुम मुझे तड़पाओगे उसी तरह मैं भी तुमको तड़पाऊंगा |

     

सदन कसाई ने हथियार रख दिया और ये शब्द उसके मस्तिष्क में गूंजने लगे “यह अदला बदला हमारा तुम्हारा युगों युगों से चला आ रहा है .....................” | अंत में परेशान होकर उसने निश्चय किया कि आज से यह काम बंद कर दूंगा | बकरे को उसने छोड़ दिया और महात्माओं की तलाश में निकल पड़ा ताकि उनसे क्षमा मांग कर अपने सारे पापों से मुक्त हो सके | भटकते भटकते अंत में राम भगवान का वह कृपा पात्र बना |