महात्मा और चोर (Wednesday, May 7, 2014)
किसी गुफा में एक महात्मा रहते थे | अगर कहीं भी लोग मुसीबत में पड़ जाते तो वे मदद के लिए पहुंच जाते थे | आकाल में पीड़ित जनता की सेवा के लिए महात्मा गुफा छोड़ चले जाते थे | असहाय लोगों की सेवा ही उनका धर्म था | उनकी दया और धर्म के भाव से लोग उनका बड़ा सम्मान करते थे |

    महात्मा की गुफा से तीन चार मील दूर पर चोर रहता था | उसके भय से लोग थर-थर कांपते थे | वह सिर्फ चोरी ही नहीं करता था जो, उसके काम में बाधा डालने की कोशिश करते थे, उन्हें पकड़ कर अपना गुलाम भी बना लेता था | जंगल में उसने गुलामों का एक समाज ही तैयार किया था | उसने चोरों का एक दल भी तैयार किया था | सरकार ने उसको गिरफ्तार करने की लाख कोशिश की पर वह इतना चालाक था कि कभी पकड़ा नहीं गया |


    एक दिन चोर महात्मा के पास पहुंचा | उसे देखकर महात्मा को बड़ा आश्चर्य हुआ | उसके पास चुराने लायक कोई समान नहीं था | महात्मा ने चोर से पूछा – “तुम यहाँ क्यों आये हो ? तुम्हारे लायक कोई समान यहाँ नहीं मिल सकता है | चोर ने साष्टांग दंडवत किया, फिर हाथ जोड़ कर कहा मेरे लायक चीजें जहाँ नहीं है वहाँ मैं नहीं जाया करता | यहाँ ऐसा धन है जो और कहीं नहीं मिलता |


    महात्मा – तुम मुझे भी सता कर ही छोड़ोगे ?


    चोर - महाराज, नाराज होने कि जरुरत नहीं | मैं कुछ चुराने के लिए नहीं आया हूँ | मैं भिक्षा मांगने आया हूँ | चोर की बातें सुनकर महात्मा को आश्चर्य होने लगा | उन्होंने कहा - तुम जो भिक्षा चाहो, दे दूँगा | चोर बोला मरने के बाद सुखी रहने का क्या उपाय है ? चोर का सवाल सुनकर महात्मा को कुछ हंसी आई | फिर भी उन्होंने कहा तुम मेरे साथ उस पहाड़ पर चलो | साथ यहाँ पड़े हुए इन तीनों पत्थरो को भी लेते चलो |


    चोर ने एक पत्थर सिर पर रखा और दो पत्थरों को दोनों कंधों पर रखा | फिर साधू के पीछे-पीछे चलने लगा | पहाड़ पर थोड़ी दूर चढ़ने के बाद चोर के लिए चढ़ाव मुश्किल मालूम होने लगा | महात्मा ने घूमकर देखा | चोर को हाँफते हुए देखकर कहा भारी लगता हो तो एक पत्थर छोड़ दो | चोर ने एक पत्थर फेंक दिया | थोड़ी देर चलने के बाद चोर कि परेशानी फिर बढ़ गई | तब महात्मा ने एक पत्थर और फेंक देने के लिए कहा | अब चोर को हलका लगने लगा | चोटी पर पहुंचने के पहले एक चट्टान थी महात्मा उस पर चढ़ गये | पत्थर लेकर चढ़ना चोर के लिए कठिन था | महात्मा ने कहा – भारी लगता हो तो इस अट्ठार को भी फेंक दो | चोर ने उसे भी फेंक दिया और चोटी पर चढ़ गया |


    महात्मा ने चोर को अपने पास बिठाकर कहा – तुमने देख लिया न ? बोझ के साथ ऊंचाई पर चढ़ना कितना कठिन होता है ? बोझ फेंक देने से चढ़ना आसान हो जाता है | चोर चुप चाप सुन रहा था | महात्मा ने फिर कहा इन तीन पत्थरों के जैसे तुम्हारी जिंदगी के रास्ते में तीन बोझ है | उन्हें फेंक देने पर ही तुम सुखी बन सकते हो | चोर बोला वे तीन बोझ क्या हैं ? महात्मा ने हँसते हुए कहा – एक तुम्हारे पास चोरी का दल है, दूसरा गुलामों का समूह है और तीसरा चोरी से कमाया हुआ धन है, तुम्हें इन तीन को त्याग देना पड़ेगा | चोर ने सिर झुका कर महात्मा के उपदेश को मान लिया | जिन्दगी के तीनों बोझों को फेंककर वह महात्मा का चेला बन गया |