ईश्वर के दरबार में अन्धेर नहीं है (Saturday, August 10, 2013)

एक ग्राम में एक ब्राह्मण दम्पति रहते थे | उन्हें कोई सन्तान न थी | दोनों प्राणी साधू महात्माओं की खूब सेवा करते थे | उनका खर्च भिक्षाटन से ही चलता था | ग्राम में कोई भी अतिथि आता था वह इन्हीं ब्राह्मण के यहां ठहरता था | अतिथि सेवा के लिये दोनों प्राणी प्रसिद्ध थे |

      एक दिन एक साधू आ गये | वे लगातार तीन दिन टिक गये | ब्राह्मण जी भिक्षाटन के लिए बाहर न जा सके | अतिथि सेवा के लिए घर में एक दाना भी नहीं था | ब्राह्मण बहुत चिंतित हुए | ब्राह्मणी ने तब कहा कि हे देवता, आप मेरे बालों को ले जांय | इसे बेचकर सामान लायें | उसी से अतिथि की सेवा हो जायेगी | ब्राह्मणी ने बाल काट कर दिए | अतिथि की सेवा के लिए भोजन बना | ब्राह्मणी ने भोजन लेकर अतिथि के सामने रखा | ब्राह्मणी अपने सिर को कपड़े से अच्छी तरह ढक ली थी और संकोच में थी | अतिथि साधू ने तब कहा, “हे ब्राह्मण दम्पति, आज क्या बात है आप लोग संकोच में हैं | ब्राह्मणी इस समय मुझसे इतनी संकोच क्यों कर रही है | जब तक आप लोग कारण नहीं बतायेंगे आपका अन्न हम ग्रहण नहीं करेंगे |” तब ब्राह्मणी ने विवस होकर अपने बाल काटने की कहानी बता दी | साधू ब्राह्मणी के त्याग को देखकर बहुत प्रसन्न हुए | उन्होंने कहा कि ब्राह्मणी तुम क्या चाहती हो | ब्राह्मणी ने कहा कि मैं निःसंतान हूं | मुझे पुत्र कि अभिलाषा है |

      साधू ने दो मिनट विचार किया और कहा कि तुम दोनों को सात जन्मों तक कोई पुत्र नहीं | परन्तु तुम यदि किसी बच्चे के रक्त से स्नान कर लोगी तो तुम्हें पुत्र लाभ होगा | ब्राह्मण चिल्ला पड़े, “महाराज, मुझे ऐसा पुत्र नहीं चाहिये | हम निःसंतान ही रहेंगे |” दूसरे दिन अतिथि साधू विदा हो गये |

      उसी दिन से ब्राह्मणी किसी लड़के की तलाश में रहती थी | एक दिन कुछ लड़के मुहल्ले में खेल रहे थे | सभी लड़के खेल में एक तरफ भागे | एक गोद का बच्चा जमीन पर बिठा कर लड़के चले गये | इतने में सुनसान देखकर ब्राह्मणी ने उस बच्चे को उठा लिया | रात्रि में उसने बच्चे की गर्दन काट दी और उसके रक्त से स्नान कर लिया | उस बच्चे को जमीन में गाड़ दिया | यह रहस्य किसी ने नहीं जाना | मुहल्ले में उस बच्चे की खोज हुई परन्तु कहीं पता न चला |

      कुछ महीने बाद ब्राह्मणी को सन्तान का योग प्रकट होने लगा | ब्राह्मण समझ गये कि इसी ब्राह्मणी ने उस बच्चे कि हत्या की है क्योंकि ब्राह्मणी को संतान का योग नहीं था | कुछ महीने बाद ब्राह्मणी को पुत्र उत्पन्न हुआ | ब्राह्मणी बहुत खुश हुई परन्तु ब्राह्मण पागल जैसा हो गये और यह कहते हुए घर से भाग गये कि ईश्वर के दरबार में अन्धेर है | चारों तरफ दुनियां में ब्राह्मण का यही आवाज लगाना कार्य हो गया था | उन्होंने अपने घर को त्याग दिया |

      ब्राह्मणी की दशा पलट गई | खूब उन्नति हुई| बच्चा सयाना हुआ| बधू आयी | नाती पोते पैदा हुए | महल बन गया | अमन चैन से वह रहती थी|

      एक दिन ब्राह्मणी के सामने उसके पोते खेल रहे थे| वह उनका किलोल देख कर खुश थी | इतने में उसका बेटा आया और घर में गया| पोतों को लेकर ब्राह्मणी भी घर में गई| अचानक ऐसा दैवयोग बना कि पूरा का पूरा मकान धंस गया और वधू पोतों, बेटा समेत ब्राह्मणी समाप्त हो गई|

      ब्राह्मण वृद्ध हो गये थे | एक दिन उनके मन में आया कि ब्राह्मणी कि दशा देखी जाय| वे अपने गांव आये| देखा न तो झोपड़ी थी न ब्राह्मणी| वहाँ एक विशाल खण्डहर सा था| उन्होंने पूछा कि भाई यहां एक ब्राह्मण ब्राह्मणी रहते थे वे लोग कहां हैं |

      गाँव वालों ने ब्राह्मणी का पूरा हाल सुना दिया | तब ब्राह्मण चिल्लाया कि ईश्वर के दरबार में अन्धेर नही है और बहुत प्रसन्न हुआ | उन्होंने अपना परिचय बताया | कि मैं वही ब्राह्मण हूं | ब्राह्मणी ने मुहल्ले के बच्चे की हत्या कर दी थी | आज परमात्मा ने मेरी साधना पूरी की | सचमुच परमात्मा के दरबार में पूरा २ न्याय है वहां तृण मात्र भी अन्धेर नहीं है | अपने कर्मों का फल सबको मिलता है |