महात्मा सब समझते है (Saturday, August 10, 2013)
एक महात्मा जी के पास एक विधवा औरत दुखी होकर आई | उसके कोई नहीं था | वह गरीब थी | महात्मा ने उसे अपने आश्रम में पनाह दे दी | वह यही रहने लगी | दिन बीतते गए | कुछ दिनों बाद उसको लेकर महात्मा जी की संगत में  कानाफूसी होने लगी | महात्मा जी ने उसे बुलाकर कहा - देख बच्ची यहाँ से हटकर दूसरी जगह चली जा खाना कपडा वहां मिलता रहेगा | मन में सोचा महात्मा जी को मजा चखाउंगी | उसने चुपचाप महात्मा जी के खिलाफ मुकदमा दायर करवा दिया और यह प्रार्थना की कि महात्मा जी ने मेरा जीवन बर्बाद किया और अब अपने आश्रम से हटने को कहते है | अतः अब मुझे उनसे खर्चा दिलवाया जाय | यह खबर आग कि तरह फैलने लगी | तरह तरह कि चर्चाएँ होने लगी  | संगत भी हिल गयी कि यह क्या हुआ | ऊहापोह मचती ही है | 
खैर महात्मा जी कि पेसी हुई कचहरी में | न्यायाधीश ने महात्मा जी से स्पष्टीकरण चाहा | महात्मा जी ने कहा अगर वह औरत मेरे सामने यह कह दे तो मैं मानने को तैयार हूँ | औरत सामने बुलाई गयी | महात्मा जी ने उसकी तरफ देखकर डांटते हुए कहा - तू सच बोल रही है कि मैंने तेरी जिन्दगी बर्बाद की है | औरत घबडा गयी और बोली - नहीं | महात्मा जी ने न्यायाधीश  से पूछा कि अभी और कोई स्पष्टीकरण मुझे देना है? न्यायाधीश चुप | खैर मुक़दमा खत्म हो गया | महात्मा जी बाहर आए | वह औरत भी निराश होकर बाहर आई | अब कहाँ जाए? अपने पैर पर स्वयं कुल्हाड़ी मारी थी |

 संगत में जिन लोगों के सिर नीचे होने लगे थे वे निगाह उठाने में भी हिचकने लगे | 
  महात्मा जी ने उस असहाय औरत को देखा | वे तो दयालु होते ही है | उन्होंने उसे पुकारा - ऐ नादान औरत ! और एक तरफ इशारा करके कहा कि जा तू उस तरफ कुटी बनाकर रहना | खाना कपड़ा मिलता रहेगा | अपनी कुटी से बाहर मत आना नहीं तो भस्म हो जाएगी | मरता क्या न करता ? उसने चुपचाप महात्मा जी की बात को मान लिया |

इस कहानी को सुनाते हुए स्वामी जी ने कहा - महात्मा सब समझते हैं जानते हैं बोलते है वक़्त पर | वेवक्त की बात अच्छी नहीं हुआ करती | कुछ रूककर स्वामी जी ने कहा - यहाँ भी किसी की चलने वाली नहीं है |