स्वार्थ त्याग (Wednesday, May 7, 2014)
 जापान देश में समुद्र तट पर एक सुन्दर ग्राम बसा हुआ था| ग्राम के पीछे एक छोटी पहाड़ी पर एक छोटा सा मंदिर था| मंदिर में मूर्ति के अलावा एक घंटा लगा था यह घंटा भयानक परिस्थिति पर बजाया जाता था|

      मंदिर से कुछ दूर एक समतल पहाड़ी पर एक सुन्दर कुटिया थी| जिसमें एक वृद्ध कृषक और उसका पोता टाँडा निवास करते थे| कुटी के सामने खेत थे जिसके द्वारा उनकी जीविका चलती थी|

      एक दिन पोता और पितामह दोनों कुटी के बाहर बैठे थे| एकाएक टाँडा कांपने लगा, कृषक भी थरथराया और दोनों ने देखा कि साधारण भूचाल आया है| धीरे धीरे समुद्र का जल किनारे से हटता जा रहा था|

      पहाड़ी के ग्राम निवासी सभी लोग समुद्र तट पर यह दृश्य देखने के लिए एकत्रित हो गये, सहसा कृषक ने टाँडा से मशाल जलाकर लाने को कहा, टाँडा कुछ समझा नहीं लेकिन मशाल जला कर लाया| वृद्ध ने मशाल ले ली और अपने खेतों की ओर दौड़ गया और खेत में आग लगा दिया|

      मंदिर के पुजारी ने यह देखकर विपत्ति का घंटा बजाना शुरू कर दिया| घंटा सुनकर लोगों ने पीछे घूमकर देखा और अग्नि की गगनचुम्बी लपटों को देखकर सब लोग टाँडा के घर की ओर चले उन लोगों ने आग बुझाने का प्रयास किया लेकिन वृद्ध ने उन्हें मना कर दिया| लोगों को जब यह पता कि वृद्ध ने स्वयं ही आग लगायी है तो और भी आश्चर्यचकित हुए|

      जब वृद्ध ने यह देखा कि सब लोग एकत्रित हो गए हैं तो उसने सांस की| लोगों ने उससे आग लगाने का कारण पूछा तो वृद्ध ने उनके घर की ओर उंगली दिखाई|

      लोगों ने देखा कि जहां उनके घर थे वहां अथाह समुद्र हिलोरें मार रहा है और वे जहां खड़े थे वहां का भाग केवल बचा है| कृषक बोला कि पहाड़ी का मंदिर अब भी बचा है कुछ लोग वहां निवास कर सकते हैं और शेष लोग मेरे खेत में रह लें|

      सब ने वृद्ध के त्याग का महत्व समझा उसने सर्वस्व स्वाहा कर लोगों के प्राण बचाए| श्रद्धा से वे लोग उसके चरणों में नत मस्तक हो गए|